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बुढ़ापा

सिसकती थक हार जीवन अंत से बेजान जर्ज़र सह थपेड़े जिंदगी के पूतों के दुत्कार बर्बर |1| झुक गईं सब अस्थियाँ कोमल त्वचा झुर्रा गयी ज्यों सर तड़ागों की कुमुदनी धूप से कुम्हला गई |2| प्रीत थी जब तक थे प्रीतम प्रियतमा कहने को कोई नींद थी, रातें भी थीं और साथ में हम-राह कोई |3| पर... अब वो प्रीतम न प्रीत जग में ना रहा हमदर्द साईं खो गए श्रृंगार सारे गेसुओं की रहनुमाई |4| अब तो बस, कुछ यादें दिल में ढेर सारी सिसकियाँ हैं दूर से आदर दिखाती, शेष कुछ नजदीकियां हैं |5| -स्वव्यस्त

आओ सब मिल एक हों हम

बातें ऊँची, ऊँचे मक़सद नीच हरकत हो गयी हमने देखा काफ़िलों को मौत लेकर सो गयी सब मरे कातिल, पुजारी आशिकी के फुलझड़ी मौत खाकर ख़ाक़ हँसती है क्या तेरी हेकड़ी ? कह रहे जितने गए सब बच सके न बन पड़ी पाक हो नापाक सब-पर मौत ये दर-दर खड़ी गर एक क्षण ही जिंदगी है क्यों न खुशियां बाँट दें ? आओ सब मिल एक हों हम खाईयोँ को पाट दें -0_0- ' स्वव्यस्त' -0_0-

भूलो तो कुछ भी याद नहीं

मन की नादानी मन में है  नैनों की कहानी  नज़रों में  भूलो तो कुछ भी याद नहीं  करो याद तो बाहें,  बाहों में  अठखेलि वही नैनों की पुरानी  खेल नज़रिये का अपना  नैनों को भाये  मन में बसे  दिल को भाये  दरगाहों में  दिल का मिलना  रोना, खोना  है दीवानापन, साँसों में  अपनों को गैर किये  चाहत में  लुट गए भरी बज़ारों में  चाहत ना थी  कोई प्यार करे  बस प्यार हमारा अपना ले  पर  चाहो गर  सब कुछ मिल जाए  फिर बात ही क्या  अभिशापों में   -0_0-  हिमांशु राय ' स्वव्यस्त' -0_0-
आज़ के अखबारों में बड़े-बड़े शहरों में ग़ालिब अखबारों में क्या छपता ! देश का बनिया लूट चवन्नी परदेशों में जा छिपता [१ ]   सरकारें अफ़रा-तफ़री में बैंक बड़े बेहाल पड़े देश-देशान्तर तू-तू मैं-मैं जनता ले अख़बार पढ़े [२ ] डुब गई लुटिया, वातिल-गमन की  नेता जी के क्या छटका? मरती तो बदहाल किसानी भारत का सोना मरता [३]   आज़ के अख़बारों में ग़ालिब न्याय छोड़ सब कुछ छपता [४] 'स्वव्यस्त' 
तुम जश्न मनाते जाते हो तुम जश्न मनाते गाते हो  जिस ख़ुशी पे तुम इतराते हो  तुम कहाँ सोच कब ये पाते  किसकी कुर्बानी खाते हो ।। कब किसके कुञ्ज उजड़ते हैं  जब हँसी तुम्हारी बेबस है  तुम कहाँ समझ भी ये पाते  किस पल-छिन क्या तुम खाते हो ।। तुम जश्न मनाते जाते हो ।। ' स्वव्यस्त '
दिल की आवारगी में, दिन का बंजारापन चाहत में डूबती कुछ, आँखों का बेचारापन दिल की आवारगी में, दिन का बंजारापन ।।   शहर एक नहीं, गाँव एक नहीं  मुझ राही को, ठाँव एक नहीं  चलता जाता, बढ़ता जाता  बाज़ारों में, भाव एक नहीं बदल गए सब, यार वो यारी  ख़्वाबों में अब, ख़्वाब एक नहीं     पूछ पड़ा मन...  बेचारी क्यूँ? ... कैसा ये मतवालापन ? दिल की आवारगी में, दिन का बंजारापन ।।   समझ-समझ कभी, थक सो जाता  कभी, रात भर नींद नहीं  नाव बहुत, इस जलडमरू, बस  नावों में, पतवार एक नहीं पीर उठी होठों की चिरकन, नियति करे दीवानापन दिल की आवारगी में, दिन का बंजारापन ।। ' स्वव्यस्त ' अच्छा लगे तो शेयर करना न भूलें ...  धन्यवाद !
'स्कीम' हाल हुआ ऐसा भारत  सब डटे आग़ में मूत रहे  और नए-नए 'स्कीम' चलाकर  जन-नायक जन लूट रहे   ।१। अरे ! गुन गाए जिन नेता के हम  हमें अकेला छोड़ गए  और परिवर्तन में सत्ता के हम  हवलदार से चोर भये  ।२। दौड़े थे दस मील नगद  खाये थे कौवे, चील, उड़द  सब खाया-गाया व्यर्थ गया  वो हमारी नइया लील गए ।३। ये करें घोटाले 2G के  और 3G में स्कैम बड़े  सब लूट रहे नित-नित उठ-उठ  हम दिन भर  बस स्पैम पढ़ें  ।४। ' स्वव्यस्त '