बना रहे तेरा यादमहल ख्वाबों में भी तू बिछड़ेगी , आहट भर से घबरा अक्सर इस सोच मे एक पागल रातों को जगा हुआ ही रह जाये टूटे ना 'यादमहल' तेरा यादों से दूर न तू जाये ।1। जित जागता ये तन रातों को तित कल्प मन में हो रहा प्रबल पाखण्ड मूलतः कभी प्रेम ये कभी असह दुःख, कभी हलाहल " निगलते हैं जो, यही सोच, मन दूर न जाये यादों से वो बना रहे, तेरा यादमहल " ।2। -0_0- हिमांशु राय ' स्वव्यस्त' -0_0-
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आज़ के अखबारों में बड़े-बड़े शहरों में ग़ालिब अखबारों में क्या छपता ! देश का बनिया लूट चवन्नी परदेशों में जा छिपता [१ ] सरकारें अफ़रा-तफ़री में बैंक बड़े बेहाल पड़े देश-देशान्तर तू-तू मैं-मैं जनता ले अख़बार पढ़े [२ ] डुब गई लुटिया, वातिल-गमन की नेता जी के क्या छटका? मरती तो बदहाल किसानी भारत का सोना मरता [३] आज़ के अख़बारों में ग़ालिब न्याय छोड़ सब कुछ छपता [४] 'स्वव्यस्त'
दिल की आवारगी में, दिन का बंजारापन चाहत में डूबती कुछ, आँखों का बेचारापन दिल की आवारगी में, दिन का बंजारापन ।। शहर एक नहीं, गाँव एक नहीं मुझ राही को, ठाँव एक नहीं चलता जाता, बढ़ता जाता बाज़ारों में, भाव एक नहीं बदल गए सब, यार वो यारी ख़्वाबों में अब, ख़्वाब एक नहीं पूछ पड़ा मन... बेचारी क्यूँ? ... कैसा ये मतवालापन ? दिल की आवारगी में, दिन का बंजारापन ।। समझ-समझ कभी, थक सो जाता कभी, रात भर नींद नहीं नाव बहुत, इस जलडमरू, बस नावों में, पतवार एक नहीं पीर उठी होठों की चिरकन, नियति करे दीवानापन दिल की आवारगी में, दिन का बंजारापन ।। ' स्वव्यस्त ' अच्छा लगे तो शेयर करना न भूलें ... धन्यवाद !
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