बेतुकी सी चाह वो सिंधु विकसित लालसाएँ चढ़ गयीं दुर्भाग्य को जो नित्य जग-जग देखता था चढ़ती-उतरती रात को ।1। पल-पल समेटा फैलती गयी इक बेतुकी सी चाह को ।2। चाहत न होती, दर्द भी, मिलता नहीं चातक अहो ! काश पल-पल ना ही तकते, बूँद इक जल स्वाति को! ।3। -0_0- हिमांशु राय ' स्वव्यस्त' -0_0-
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दीवानगी, रोती रही चाह में उनके, किनारे छोड़-कर सब, चल पड़े सम्भले जब कदम, नयन मुकाम देख, रो पड़े ये बेवजह, किस चाह में हम, खुद की साख खो-खड़े? रो-रो के अश्क , इश्क़ में ये आंखें, सूजती रहीं ख्वाब, लापता हुए दीवानगी, रोती रही दर्द की, कहानियाँ बहुत सुनी थीं, प्यार में थे न सच से, बेख़बर अज्ञान बनकर, बढ़ गये दुर्भाग्य था गज़ल, मिली ना हाँथ लग गयी, शायरी चोट पर, मरहम लगाती रो रही, कह बाँवरी ये, चाह में किसके किनारे, छोड़कर सब चल दिए, तुम आशिक़ी की बाढ़ में, क्यूँ होश खोये, बह गये तुम? -0_0- हिमांशु राय ' स्वव्यस्त' -0_0-
अविस्वास चमकती चाँदनी बिखरी सवेरा हर पहर फैला अँधेरी हैं तो बस गलियाँ जमाने के दिलों लाला ।1। वो जिन हाथों में सौंपी थी अमुल जीवन-कुसुम कलियां दगेबाजी के डर शायद उन्होंने भूल कर डाला ।2। जो हमको जान से प्यारा उन्हीं नज़रों में हम काले जो ये सोचा भभक बैठी न मिटती आग ना ज्वाला ।3। भयानक स्वप्न घर करते चढ़ा निज विम्ब पर माला हमीं ने गम के मारे खुद हमीं का कत्ल कर डाला ।4। समझ में बात आयी अब जो ख्वाब-ए-कत्ल कर डाला न मेहँदी रंग लाती है न ऑंखें सुरमे से काला ।5। यहाँ सब खेल उल्टा है बुना मकड़ी का घन-जाला वो हाँथो का करिश्मा था कहीं आँखों ने कर डाला ।6। -0_0- हिमांशु राय ' स्वव्यस्त' -0_0-
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