बेतुकी सी चाह वो सिंधु विकसित लालसाएँ चढ़ गयीं दुर्भाग्य को जो नित्य जग-जग देखता था चढ़ती-उतरती रात को ।1। पल-पल समेटा फैलती गयी इक बेतुकी सी चाह को ।2। चाहत न होती, दर्द भी, मिलता नहीं चातक अहो ! काश पल-पल ना ही तकते, बूँद इक जल स्वाति को! ।3। -0_0- हिमांशु राय ' स्वव्यस्त' -0_0-
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आज़ के अखबारों में बड़े-बड़े शहरों में ग़ालिब अखबारों में क्या छपता ! देश का बनिया लूट चवन्नी परदेशों में जा छिपता [१ ] सरकारें अफ़रा-तफ़री में बैंक बड़े बेहाल पड़े देश-देशान्तर तू-तू मैं-मैं जनता ले अख़बार पढ़े [२ ] डुब गई लुटिया, वातिल-गमन की नेता जी के क्या छटका? मरती तो बदहाल किसानी भारत का सोना मरता [३] आज़ के अख़बारों में ग़ालिब न्याय छोड़ सब कुछ छपता [४] 'स्वव्यस्त'
सोच मैं उनके सहारे जो किया, था वो गलत? या किया जिससे, गलत था? कर रहा, क्या वो सही है? या के सोचा ही गलत था? ।1। उलझ ऐसी, उधेड़बुन में लड़खड़ा, जाता कभी मैं गिर भी जाता, हूँ कभी फिर, सम्भल जाता आप से ।2। गिरते सम्भलते, लड़खड़ाते चल रहा हूँ, अनवरत न साथ कोई, है न मंजिल ना हि दिखते, अब किनारे ।3। मुड़ सकूँ, एक बार फिर से बदलने, खुद के सितारे छोड़ आया, जिनको पीछे सोच मैं उनके सहारे ।4। -0_0- हिमांशु राय ' स्वव्यस्त' -0_0-
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