मैं छायादित अन्तस्तर मेरा कारण ये नश्वर काया जैसे, पूर्ण - प्रकाश-विमुख दीपक कारण सर्वस निज की काया मैं तो स्वेत, प्रकाश मात्र बस अँधियारा ये तन लाया मैं सुत अजर-अमर, आजन्मा नश्वर जीवन, छल,माया -0_0- हिमांशु राय ' स्वव्यस्त' -0_0-
परदेशों में जा छिपता [१ ]
भारत का सोना मरता [३]
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दौलत दौलत के भरोसे ये दुनिया दौलत की मची मारा-मारी ।1। कोई कमा रहा, कोई लूट रहा कोई छींट रहा, कोई बीन रहा कोई मांग रहा, कोई छीन रहा कोई बैठे-बैठे, गीन रहा रफ़्तार से, ये दुनिया चलती दौलत के लिए, ये रफ़्तारी दौलत के भरोसे, ये दुनिया दौलत की मची. मारा-मारी ।2। दौलत को बने कोई, व्यापारी दौलत ही को कोई, बना भिखारी दौलत जो हो, व्याहो बेटी बिन व्याह रखो या, घर में कुँवारी दौलत के भरोसे, ये दुनिया दौलत की मची, मारा-मारी ।3। जेबें जो भरी हों, रेजकारी बहुतेरे बिकते, अधिकारी अरे ! मोल भाव भी, कर लेते ख़िदमत जो करे, दोस्ती-यारी दान-स्पर्धा में, पिछड़ गए बरती जाएगी, ईमानदारी दौलत के भरोसे, ये दुनिया दौलत की मची, मारा-मारी ।4। दौलत जो उड़ाए, अधिकारी है हाँथ पसारे, खड़ा भिखारी जितनी दौलत, उतनी ताकत उतने ही करतब, जेबों में खाली जेबें, कठपुतली क...
अविस्वास चमकती चाँदनी बिखरी सवेरा हर पहर फैला अँधेरी हैं तो बस गलियाँ जमाने के दिलों लाला ।1। वो जिन हाथों में सौंपी थी अमुल जीवन-कुसुम कलियां दगेबाजी के डर शायद उन्होंने भूल कर डाला ।2। जो हमको जान से प्यारा उन्हीं नज़रों में हम काले जो ये सोचा भभक बैठी न मिटती आग ना ज्वाला ।3। भयानक स्वप्न घर करते चढ़ा निज विम्ब पर माला हमीं ने गम के मारे खुद हमीं का कत्ल कर डाला ।4। समझ में बात आयी अब जो ख्वाब-ए-कत्ल कर डाला न मेहँदी रंग लाती है न ऑंखें सुरमे से काला ।5। यहाँ सब खेल उल्टा है बुना मकड़ी का घन-जाला वो हाँथो का करिश्मा था कहीं आँखों ने कर डाला ।6। -0_0- हिमांशु राय ' स्वव्यस्त' -0_0-
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