चुनावी-भूत चढ़ा चुनावी भूत उतर गए, जनता में जनदूत नयन में, घड़ियाली आँसू पहन-कर, पाखण्डों का बूट । अभी कुछ खुद को कोशेंगे वामदल को, फिर जोतेंगे काम कुछ, कर न सके गर क्या काम की, दुंदुभि पीटेंगे । कोई अपना, वन भेजेंगे सारी सुविधाएँ, पीछे से मिलन कर, राम-भरत का फिर सहज, अन्याय में लोटेंगे । करेंगे, वादे सच्चे सब लिए, मायूसी चेहरे पे हाँथ बस, सत्ता तो आये भरेंगे, ठंढे बस्ते सब । नगर में, चारे डालेंगे नया कोई, बेटा पालेंगे किसी के, नाती-पोता बन सभी के, जूता चाटेंगे । यही, सावन इनके मन का प्रीत, इनकी जनता से अब मिटे सब, भूख-प्यास नित-कर्म सुनाएंगे, पग-पग सत्संग । अज़ब हालत, इस धरती की भुलक्कड़, जनता भोली की पाँच सालों में, जो भूले करामातें, इन भूतों की । 'स्वव्य्स्त'
Posts
- Get link
- X
- Other Apps
तब क्या होगा मानवता का ! दरिंदगी दर -दर मुँह-लोलुप जिस्म, खून, दौलत चखने को हवस में आँखें माड़ गयीं और जुनूँ में भूल गए अपनों को ।१। घर से चली, बाज़ार को बिटिया डरी उखड़ती, सांसों में घर वापस आने तक सब चिन्तित किस हाल में लिपटी लाश मिले क़ब ।२। कभी लोग पराए थे दुश्मन अब अपने हाँथ लगे दामन बिस्ता-बिस्ता चटके रिश्ते कोई ओट से झाँक रहा आँगन ।३। जड़ , जिश्मफरोशी शीशमहल में धूल झोंक चलती पायल में रुकते-रुकते अवरोधक बिकते नोट, नवेली-नट, ताकत में ।४। अनाचार आचारपरक और दुराचार व्यवहार हुआ साधू भी अय्यास निकल गए बहुधा पर्दाफ़ाश हुआ ।५। अफ़सोस नहीं इस परिवर्तन का सोच रहा मैं पचपन का अभी बमुश्किल नैतिकता है ...
- Get link
- X
- Other Apps
शहर में कर्फ़्यू अपनी कुछ नयी पुरानी स्मृतियों से मेरे मस्तिष्क में उठने वाले, दंगों के उन भयानक दृश्यों को शब्दों में पिरोने की कोशिश की है, जिनकी कल्पना मात्र से ही ऑंखें नम और रोएँ भरभरा जाते हैं और साथ ही एक छोटी सी आशा भी की है, एक ऐसे दिन की ज़ब धर्मध्वजी का ये खेल समाप्त कर अमन के साथ मानवता की सुरभित कलियाँ दशों दिशाओं को सुगन्धित करेंगी मची शहर के, गलियारों में आनन -फानन अति भारी बार एक फिर, धर्मध्वजी में गई जगत की मति मारी ।१। पुलिस के जत्थे, चौक पे चौकस दहशतगर्दी गलियों में खून की धारें, फूटीं पग-पग लाश की जमघट नदियों में |२। हैवान की नंगी, सूरत नचती नेपथ्य, कहीं चौबारों में अस्मत लुटती थी चीख़ दब गयी बाग-बाग दीवारों में ।३। सन्नाटा, झन्नाहट पग-पग जहाँ थे कल तक, ठेले-मेले खून के थक्के, जमे जहाँ-तँह कल को बिकते, थे केले ।४।...
- Get link
- X
- Other Apps
याद में तिल-तिल तड़पना याद में तिल-तिल तड़पना रात का जगना झलक भर को एक-बस वीरान में नज़रें भटकना जाने क्या दीवानगी है अजब दिल का टूट, हँसना याद में तिल-तिल तड़पना अश्क पलकों से फिसलना मुस्कुराकर बात करना सुन सके न कोई, उस आवाज़ से पल-पल बिलखना याद में तिल-तिल तड़पना बेरुखी अंदाज़ में कुछ बेसुधी सी होश में वो, महफ़िलों में, तेरी गोरी बाहों का न होना खलना याद में तिल-तिल तड़पना नींद में भी, होश में भी रात आते स्वप्न में भी स्मरण करना तुम्हारी तुमसे सब बेबाक कहना चाहतों की बातें करना स्वप्नों का सजना, विखरना मंज़िलें जिनके लिए सब राज सब संसार तजना अब हैं लगतीं बेवजह ये बेतुका मन का बहकना याद में तिल-तिल तड़पना 'स्वव्यस्त'
- Get link
- X
- Other Apps
बादल यादें भर-भर लाया बादल यादें भर-भर लाया तन्हाई का मौसम छाया छम-छम करता कहर बरसता दिल की आह! से मन भर आया बादल यादें भर-भर लाया नींद रात की उड़-उड़ जाती अश्क़ों ने लब-पलक भिंगाया चैन दिवस भर नहीं एक पल आशाओं से मन अकुलाया बादल यादें भर-भर लाया तम के तीन प्रहर जा निकले स्वप्न में शोक ने विघ्न लगाया जोर-जोर अति सिसक रहा कोई कहता प्यार किया क्या पाया ? बादल यादें भर-भर लाया | | -0_0- हिमांशु राय ' स्वव्यस्त' -0_0-
- Get link
- X
- Other Apps
फिर एक पेड़ को कटते देखा फिर एक पेड़ को कटते देखा लौह खम्भ को गड़ते देखा नूतनता से चिर के पञ्जर लड़ते-लड़ते गिरते देखा फिर एक पेड़ को कटते देखा बचपन जिनकी ऊँगली पकडे गिरते-गिरते चलना सीखा सनम-कमाई के फेरों में बाप-पूत में बँटते देखा फिर एक पेड़ को कटते देखा रेल के ऊपर से बस दौड़ी पुल के नीचे छुक-छुक रेल घोड़े-टट्टु गए तबेले मोटर ऊँट को चढ़ते देखा फिर एक पेड़ को कटते देखा -0_0- हिमांशु राय ' स्वव्यस्त' -0_0-
- Get link
- X
- Other Apps
आ मानस तुझे एक, हक़ीकत सुनाऊँ आ मानस तुझे एक, हक़ीकत सुनाऊँ अपने भय से जने, गरल के प्याले पिलाऊँ दिल के चाहने से मिलता, न चाह रोक पाता अपनी आदत से मज़बूर, पीर में मुस्काता तेरा दर्द देख तुझको, सहारा दिखाऊँ आ मानस तुझे एक, हक़ीकत सुनाऊँ ख़ुदा से भी ज़्यादा, मैं ख़ुद से डरा हूँ ये सच ये हक़ीकत है, घबरा रहा हूँ क्योंकि ज़िंदगी कुटिल, जाने कब काट खाए मैं ख़ुद को भूल जाऊँ, एक भूल बस हो जाए न मुझमें बुराई, तनिक भी मग़र जाने कब जाने कैसे, कोई नीचता दिखाऊँ आ मानस तुझे, ये हक़ीकत सुनाऊँ -0_0- हिमांशु राय ' स्वव्यस्त' -0_0-