यह ब्लॉग मुख्यतः कविताओं के निमित्त है, जिनकी रचना मैं अपनी ख़ुद की सोच से करता हूँ, अगर आपको पसन्द आयें तो कृपा कर इन्हें ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाने का कष्ट करें।
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मैं
छायादित अन्तस्तर मेरा
कारण ये नश्वर काया
जैसे, पूर्ण-प्रकाश-विमुख
दीपक
कारण सर्वस
निज
की काया
मैं तो स्वेत, प्रकाश मात्र बस
अँधियारा ये तन लाया
मैं सुत अजर-अमर, आजन्मा
नश्वर जीवन, छल,माया
-0_0- हिमांशु राय 'स्वव्यस्त' -0_0-
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बेतुकी सी चाह वो सिंधु विकसित लालसाएँ चढ़ गयीं दुर्भाग्य को जो नित्य जग-जग देखता था चढ़ती-उतरती रात को ।1। पल-पल समेटा फैलती गयी इक बेतुकी सी चाह को ।2। चाहत न होती, दर्द भी, मिलता नहीं चातक अहो ! काश पल-पल ना ही तकते, बूँद इक जल स्वाति को! ।3। -0_0- हिमांशु राय ' स्वव्यस्त' -0_0-
आज़ के अखबारों में बड़े-बड़े शहरों में ग़ालिब अखबारों में क्या छपता ! देश का बनिया लूट चवन्नी परदेशों में जा छिपता [१ ] सरकारें अफ़रा-तफ़री में बैंक बड़े बेहाल पड़े देश-देशान्तर तू-तू मैं-मैं जनता ले अख़बार पढ़े [२ ] डुब गई लुटिया, वातिल-गमन की नेता जी के क्या छटका? मरती तो बदहाल किसानी भारत का सोना मरता [३] आज़ के अख़बारों में ग़ालिब न्याय छोड़ सब कुछ छपता [४] 'स्वव्यस्त'
दिल की आवारगी में, दिन का बंजारापन चाहत में डूबती कुछ, आँखों का बेचारापन दिल की आवारगी में, दिन का बंजारापन ।। शहर एक नहीं, गाँव एक नहीं मुझ राही को, ठाँव एक नहीं चलता जाता, बढ़ता जाता बाज़ारों में, भाव एक नहीं बदल गए सब, यार वो यारी ख़्वाबों में अब, ख़्वाब एक नहीं पूछ पड़ा मन... बेचारी क्यूँ? ... कैसा ये मतवालापन ? दिल की आवारगी में, दिन का बंजारापन ।। समझ-समझ कभी, थक सो जाता कभी, रात भर नींद नहीं नाव बहुत, इस जलडमरू, बस नावों में, पतवार एक नहीं पीर उठी होठों की चिरकन, नियति करे दीवानापन दिल की आवारगी में, दिन का बंजारापन ।। ' स्वव्यस्त ' अच्छा लगे तो शेयर करना न भूलें ... धन्यवाद !
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' प्रतिक्रिया देने के लिए आपका कोटि-कोटि धन्यवाद ' - 'स्वव्यस्त'